Sar Dhakna Adab Hai

Sar Dhakna Adab Hai.

सर ढकना अदब है

सर ढकना अदब की अलामत है निशानी है, यहाँ हमारी शान व पहचान भी है हमारे कुछ मुस्लिम भाइयों की यह सोच बन गयी है की सर ढकना तो शिर्फ़ नमाज़ में ही ज़रूरी है, बल्किएक जमात तो अब नग्गे सर नमाज़ पड़ने में फकर महसूस करती है.

सर-ढकना-अदब-है

याद रखिये – सर ढकने का दस्तूर बड़ा पुराना है, अलग अलग मुल्को इलाको में सर ढकने के लिए टोपी का इस्तेमाल होता है, सब की अलग अलग पहेचन है मुसलमान के अलावा बहुत सी गैर मुस्लिम कौमे भी सर ढकने के लिए टोपी का इस्तेमाल कर रही है, कुछ की तो खश अंदाज़ की टोपी ही उनका कौमी पहचान है टोपी के अलावा सफा – पगड़ी बांध कर भी सर ढकने का चलन सदियों पुराण है पैग़म्बरे इस्लाम और आपके सहाबा ने भी अममे बांधे है और इसकी बड़ी फ़ज़ीलत बयां फ़रमाई है

बहुत सारे दफ्तरों में भी एक नयी स्टाइल की टोपी.

यही नहीं बहुत सरे सरकारी दफ्तरों में भी एक नयी स्टाइल (तरीके) की टोपी पहनी पहनाई जाती है वही उस डिपार्टमेंट की पहचान बन जाती है, किसी किसी डिपार्टमेंट में एक खश अंदाज़ की पग़डी बांधनी पड़ती है वही उसकी पहचान होती है वह टोपी या पगड़ी लाज़मी होती है उसकी खिलाफ वर्जी को सग्गिने जुर्म मना जाता है, यही नहीं सियासी पार्टयों की भी एक अपनी- अपनी टोपियन व पगड़ी है बादशाहो और राजवडे में पगधियों को सर का ताज मानाजाता है इसलिए उसकी पगड़ियों में हियर जहवरत जेड होते है, क्योंकि सर बदन का सब से ऊपरी हिस्सा है इसलिए उसके बहुत मर्तबा है इसलिए टोपी, सफा, पगड़ी को सर का ताज मन व समझा जाता है, उसकी हिफाज़त के लिए लोगो ने अपनी जाने क़ुर्बान की है.

बेहयाई वा बेगैरती के इस योग में नग्गे सर रहना एक फैशन बन चूका है और मुसलमान शिर्फ़ नमाज़ के वक़्त टोपी पहनने सर ढकने को ज़रूरी समझते है जब की इस्लम ने नग्गेसर खाने- पीने और पाखाने -पेसाहब करने से भी मन किया है. लेकिन क्या किया जाये मर्द की बायत छोड़िये, अब की औरते अपने सर ढकने की ज़रूरत नहीं समझ रही है जब की औरतो के लिए नग्गे सार होना हराम है, सर और सर के बाल का छुपाना भी फ़र्ज़ है नग्गे सर होने की वजह से बहुत सैर बालाएं उनके सर आ रही है फिर भी होश की आखे नहीं खुल रही है. अल्लाह हिदायत दे!!


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